Tuesday, April 28, 2026

 

चीयरलीडर्स

बल्लेबाज़ मैदान में उतरता हैधूप में, पसीने में, गेंद की मार झेलते हुए। जब वो छक्का मारता है तो पूरी टीम खुश होती हैउसके साथी, उसके कोच, उसके समर्थक। यह खुशी earned होती हैखून-पसीने से कमाई हुई।

गेंदबाज़ दौड़ता हैबार-बार, थककर भी, हारकर भी। जब विकेट गिरता है तो टीम झूम उठती है। यह भी earned खुशी है। 

पर मैदान के किनारे एक और दल होता है। चीयरलीडर्स। यह प्रजाति बड़ी विलक्षण होती है। छक्का लगा? नाचो। विकेट गिरा? नाचो। बारिश आई? नाचो। टॉस हुआ? नाचो। 

इन्हें बल्लेबाज़ी आती है, गेंदबाज़ी। फील्डिंग की ज़रूरत, फिटनेस की। न नेट प्रैक्टिस । इन्हे बस एक काम आता है जो भी जीते, नाच लो।

और यह केवल क्रिकेट की बात नहीं है। हर दफ़्तर में, हर संस्थान में, हर संगठन मेंचीयरलीडर्स की एक पूरी टीम होती है। पक्की, प्रशिक्षित, और हर मौसम में तैयार।

जब बॉस ने कोई नीति बनाई"वाह सर, क्या सोच है आपकी!" जब बॉस ने वही नीति बदली"बिल्कुल सही किया सर, पहले वाली तो ठीक थी ही नहीं!" जब बॉस बदलाउसी कुर्सी के सामने, उसी मुस्कान के साथ"नमस्ते सर, आपका तो बहुत समय से इंतज़ार था!" इन्हें विचारधारा से मतलब, नीति से, सिद्धांत से। इनकी एकमात्र विचारधारा है"जो कुर्सी पर है, वो सही है।

असली खिलाड़ी रात को जागकर सोचता है"कल का मैच कैसे जीतूँ?" चीयरलीडर रात को जागकर सोचता है"कल कौन सा नेता रहा है, कौन सा रंग पहनूँ?" असली खिलाड़ी का करियर उसके प्रदर्शन पर टिका है। चीयरलीडर का करियर उसकी उपस्थिति पर टिका हैसही वक्त पर, सही जगह, सही नारे के साथ। 

और सबसे मज़ेदार बातअसली खिलाड़ी थककर घर जाता है। चोट लगती है तो दर्द होता है। हारता है तो रातें काली होती हैं। पर चीयरलीडर?

वो आराम से घर जाता है। उसे चोट नहीं लगतीक्योंकि वो मैदान में उतरता ही नहीं। वो कभी नहीं हारताक्योंकि वो किसी एक टीम का नहीं होता।  उसकी ज़िंदगी सबसे आरामदायक होती हैऔर विडंबना यह है कि कई बार पुरस्कार भी उसी को मिलता है। 


Tuesday, September 26, 2023



मिलने पर बताऊंगा  

दिन-दिन भर ऐसे ही बैठा रहूं 

बीते दिन की यादों में खोया रहूँ 

पूरा दिन पता नहीं कैसे बीत जाता है 

मुझको हरा के ये समय जित जाता है 

बहुत सी है बाते जो तुमको सुनाऊंगा 

ये सारी बाते मै मिलाने पर बताऊंगा 


वो वाला तुमने जो परचा लिखा था 

वही परचा जिसका चरचा हुआ था 

व्याकरण में उसके उलझ रह जाती हो 

मात्रा को अब भी मै सुलझ नहीं पाती हो  

व्याकरण की बाते मैं तुमको सुनाऊंगा 

कैसे ठीक करना है वो मिलने पर बताऊंगा 


आँगन में तुमने जो पौधा लगाया था 

पौधा जिसे आँचल से सहलाया था 

एकटक निगाहों से मुझे देखा करता है 

मेरे साथ साथ शायद तुम्हे ढूंढा करता है 

उस पौधे की सारी बाते मैं बताऊंगा 

कैसा दिखता है वो मिलाने पर बताऊंगा 


हर सुबह जब भी मैं चाय बनता हूँ 

ख्वाब तुमसे मिलने के बुनता बनाता हूँ 

प्याली एक चाय की सामने जो आती है 

उस प्याली में तेरी तस्वीर दिख जाती है 

चाय बनाके मैं तुमको पिलाऊंगा  

चाय पर की बातें सब मिलने पर बताऊंगा 


यूनिवर्सिटी की बातें क्या याद है?

सख्त वाले सर् की डांटे क्या याद हैं?

कैंपस में घूमती हुई गाय याद आती है

कोने वाले कैंटीन की चाय याद आती है

इस नए कैंपस की बाते मैं बताऊंगा

क्या नई सुविधाएं है वो मिलने पर बताऊंगा


साथ जो फरमाई थी वो इश्कियां क्या भूल गयी?

सुनसान रातों की वो शिसकियाँ तुम भूल गयी?

जाड़ा तो अब भी है और वही महीना है

पर गायब है जो वो माथे का पसीना है 

अपनी नई रातों की कहानी मैं सुनाऊंगा

कैसे कटतीं है ये वो मिलने पर बताऊंगा


संगम की अपनी मुलाकात याद आती है 

माघ मेले की वो रात याद आती है 

तेरे बिन ये संगम पूरा नहीं लगता है 

नदियों का मिलना भी अधूरा सा लगता है 

इस माघ मेले की बाते मैं बताऊंगा 

कैसा मेला दिखता है वो मिलने पर बताऊंगा 

मिलने पर बताऊंगा 

                                                                                                           प्रो. रणजीत सिंह 

Friday, August 19, 2022

 

चहकती रहो 

चहकती रहती है हमेशा, वो एक बुलबुली  है 

घर में रहती है तो रहती मची, खलबली सी है 

मेरी बेटी, मेरा नाज़, वो है मेरे दिल का ताज 

मुझको हमेशा सजाते रहती, खुद तो वो चुलबुली सी है 


किसी को मम्मी बनाया, मुझको पापा बनाया 

किसी को दादी बनाया, किसी को दादा बनाया 

बन गए नाना, नानी, मामा, चाचा, मौसी जैसे नए शब्द 

हर एक रिश्ते को नया नया जामा पहनाया 


चहकती रहो, निखरती रहो 

मेरे आँगन में तुम महकती रहो 

जीवन के सारे रंग बिखेरती रहो 

सूरज की तरह दुनिया में चमकती रहो 

Thursday, June 30, 2022

डमलू चाचा-भाग ३ 

डमलू चाचा की नीचता  

साथियों अब तक तो आप को समझ आ गया होगा की डमलू चाचा कितने उच्च श्रेणी के नीच व्यक्ति हैं।  उनकी नीचता के किस्से जितने कहे जाये उतने कम होंगे। आज उनकी नीचता के कुछ किस्से प्रस्तुत करता हूँ। 

डमलू चाचा के छोटे भाई ने पुस्तैनी संपत्ति में अपना हिस्सा अलग कर लिया।  अपने हिस्से में आयी खेती और बाकि पारिवारिक सम्पत्तियों से अपने परिवार का भरण पोषण करने लगे।  इसी दौरान अपने हिस्से में आये हुए खेत में उन्होंने अपना अलग घर बनवा लिया यानि पुस्तैनी मकान से हटकर अपना बिलकुल अलग मकान।  डमलू चाचा को ये कहाँ अच्छा लगता? अब आये दिन ये भी कहते रहते हैं कि उस मकान में भी उनका हिस्सा है जो उनके छोटे भाई नें अलग होकर विशुद्ध रूप से अपने निजी पैसे से बनवाया है। ध्यान देने योग्य बात ये है कि उस मकान में डमलू चाचा का कोई भी योगदान नहीं है। आये दिन ये धमकी देते रहते हैं कि अगर उस मकान में हिस्सा नहीं मिला तो उसके लिए न्यायालय में जायेंगे और घर गिरवा देंगे। मतलब साफ़ है की उनके अलावा अगर कोई आराम से रहता है तो डमलू चाचा को उस व्यक्ति का सुख देखा नहीं जाता। नीचता की पराकाष्ठा है की अगर किसी नें  संघर्ष और लगन से अपने और अपने परिवार के लिए कुछ किया है तो ये बातें डमलू चाचा के लिए असहनीय हैं। 

चलिए अब उनकी नीचता की दूसरी कहानियों पर आते हैं। उनके बड़े भाई नें अपने रिटायरमेंट के बाद जो पैसे मिले थे उससे अपने लिए पुस्तैनी घर के प्रथम तल पर दो कमरे बनवाये। यहाँ भी याद दिलाता चलूँ की पूरे घर पर डमलू चाचा का कब्ज़ा था।  सामूहिक रूप से जो घर बना था (जिसमे सभी भाइयों ने अपना पैसा लगाया था), उसपर डमलू चाचा कब्जियाये हुए थे। उनके बड़े भाई ने सोचा की झगड़ा करने से बढियाँ है की निचे के कमरों में डमलू चाचा और उनके परिवार रहने  जाये और अपने लिए ऊपर दो  कमरे बनवा लेते हैं।  उन्होंने डमलू चाचा और उनके बड़े बेटे लबधू भइया से बात करके ऊपर के दोनों कमरे बनवाये। कमरे काफी अच्छे और हवादार भी बन गए।  अब डमलू चाचा का दिमाग चलने लगा की इतने अच्छे कमरे तो सिर्फ मेरे पास रहने चाहिए।  डमलू चाचा के अतिरिक्त कोई उस घर में आराम से रह ले यह कैसे हो सकता है। डमलू चाचा रोज  उन कमरों पर भी अपनी दावेदारी पेश करने लगे। मक्कारी की हद तो तब तो गयी जब वो पूरी बेशर्मी से कहने लगे कि "ये दोनों कमरे मैंने अपने पैसे से बनवाये हैं और किसी नें कोई सहयोग नहीं दिया है। " नीचे के पूरे घर पर भी कब्ज़ा जमा कर उनका पेट नहीं भरा और यहाँ भी किसी और ने अपने जीवन  की कमाई से अगर अपने लिए कुछ बनवा लिया तो उनकी छाती पर सांप लोटने लगा।

कमरों को लेने के लिए उन्होंने एक चाल चली जो मक्कारी की पूरी पराकाष्ठा पार कर देती है।  उन्होंने मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत दर्ज की कि पूरा घर ऊपर से लेकर निचे तक उन्होंने ही बनवाया है। उनके बड़े भाई को जब अपने बच्चों की शादी करनी थी तो डमलू चाचा ने दया भाव दिखते हुए ऊपर के दोनों कमरे अपने बड़े भाई को  दिए जिसे बाद में उनके बड़े भाई ने कब्ज़ा कर लिया। डमलू चाचा नें गुहार लगायी की दोनों कमरे खाली करवा कर उनको दिए जाये। हालाँकि वो उसमें कामयाब नहीं हो सके लेकिन ये शिकायत अपने आप में काफी है ये बताने लिए कि डमलू चाचा कितने घटिया, गिरे हुए और नीच व्यक्ति हैं। शिकायत दर्ज करवानें का मतलब बिलकुल साफ़ था की उनके बड़े भाई न सिर्फ अपनी गाढ़ी कमाई से बनवाया हुवा घर छोड़े बल्कि बेघर होकर सड़क पर आ जाएँ।    

उनके बड़े भाई द्वारा बनवाये घर को कब्ज़ा करने का प्लान अचानक नहीं उठा था डमलू चाचा के मन में। पहले उनका  प्लान ये था कि उसमें मूलभूत सुविधाएँ लगाने ही नहीं देतें है जैसे की बिजली-पानी और बिना पानी और बिजली के कोई कैसे रहेगा। इसीलिए जब पानी के लिए ऊपर टंकी बैठाने का काम हो  था तो डमलू चाचा ने रोकने की पूरी कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो पाए और ऊपर के कमरों को कब्ज़ा करने का प्लान धराशायी हो गया।  फिर डमलू चाचा को खुलकर नंगा होना पड़ा और उनका घिनौना चेहरा दुनिया के सामने आ गया।