चीयरलीडर्स
बल्लेबाज़ मैदान
में
उतरता
है
— धूप
में,
पसीने
में,
गेंद
की
मार
झेलते
हुए।
जब
वो
छक्का
मारता
है
तो
पूरी
टीम
खुश
होती
है
— उसके
साथी,
उसके
कोच,
उसके
समर्थक। यह
खुशी
earned होती
है
— खून-पसीने से कमाई
हुई।
गेंदबाज़ दौड़ता
है
— बार-बार, थककर भी,
हारकर
भी।
जब
विकेट
गिरता
है
तो
टीम
झूम
उठती
है।
यह
भी
earned खुशी
है।
पर मैदान के किनारे एक और दल होता है। चीयरलीडर्स। यह प्रजाति बड़ी विलक्षण होती है। छक्का लगा? नाचो। विकेट गिरा? नाचो। बारिश आई? नाचो। टॉस हुआ? नाचो।
इन्हें न बल्लेबाज़ी आती है, न गेंदबाज़ी। न फील्डिंग की ज़रूरत, न फिटनेस की। न नेट प्रैक्टिस । इन्हे बस एक काम आता है — जो भी जीते, नाच लो।
और यह केवल क्रिकेट की बात नहीं है। हर दफ़्तर में, हर संस्थान में, हर संगठन में — चीयरलीडर्स की एक पूरी टीम होती है। पक्की, प्रशिक्षित, और हर मौसम में तैयार।
जब बॉस ने कोई नीति बनाई — "वाह सर, क्या सोच है आपकी!" जब बॉस ने वही नीति बदली — "बिल्कुल सही किया सर, पहले वाली तो ठीक थी ही नहीं!" जब बॉस बदला — उसी कुर्सी के सामने, उसी मुस्कान के साथ — "नमस्ते सर, आपका तो बहुत समय से इंतज़ार था!" इन्हें न विचारधारा से मतलब, न नीति से, न सिद्धांत से। इनकी एकमात्र विचारधारा है — "जो कुर्सी पर है, वो सही है।"
असली खिलाड़ी रात को जागकर सोचता है — "कल का मैच कैसे जीतूँ?" चीयरलीडर रात को जागकर सोचता है — "कल कौन सा नेता आ रहा है, कौन सा रंग पहनूँ?" असली खिलाड़ी का करियर उसके प्रदर्शन पर टिका है। चीयरलीडर का करियर उसकी उपस्थिति पर टिका है — सही वक्त पर, सही जगह, सही नारे के साथ।
और सबसे मज़ेदार बात? असली खिलाड़ी थककर घर जाता है। चोट लगती है तो दर्द होता है। हारता है तो रातें काली होती हैं। पर चीयरलीडर?
वो आराम से घर जाता है। उसे चोट नहीं लगती — क्योंकि वो मैदान में उतरता ही नहीं। वो कभी नहीं हारता — क्योंकि वो किसी एक टीम का नहीं होता। उसकी ज़िंदगी सबसे आरामदायक होती है — और विडंबना यह है कि कई बार पुरस्कार भी उसी को मिलता है।
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